Friday, November 4, 2011

केसा भी दुःख हो तो

सनातन धर्म में गायत्री मंत्र महामंत्र माना गया है. धार्मिक दृष्टि से सृष्टि की रचना करने वाले ब्रह्मदेव को जगत की चेतना शिक्त के ह्वप में प्राप्त गायत्री मंत्र प्राणी जगत के लिए हर संकट का अंत करने वाला माना गया है. इस शिक्त को ब्रह्मदेव ने वेदों के माध्यम से प्राणियों तक पहुंचाया। गायत्री मंत्र वेद मंत्र है. माता गायत्री ही वह प्राणशिक्त है, जो गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में समाई है. यह गुरु मंत्र भी कहा गया है. क्योंकि जिस तरह गुरु बुद्धि को शुद्ध और सात्विक बना जिंदगी को सही दिशा देता है। यही कार्य गायत्री मंत्र शिक्त से होता है. इसलिए गायत्री मंत्र जप बुद्धि, बल, ऊर्जा और स्वास्थ्य देने वाला माना गया है. इसका नियमित जप दु:खों और कष्टों से रक्षा करने वाला और पापों से मुक्त करने वाला माना गया है. धार्मिक महत्व की दृष्टि से गायत्री मंत्र दु:खों का नाश करने वाले ब्रह्म शिक्त का स्मरण है. अगर इसका एक बार भी जाप कर लिया जाए तो पूरे दिन के, सौ बार मंत्र जप कर ने पर पूरे माह के और एक हजार बार मंत्र जप से वर्षों के, एक लाख जप से जीवनभर के और एक करोड़ मंत्र जप से जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं. शुक्रवार के दिन शिक्त उपासना प्रभावी मानी जाती है. इस दिन गायत्री उपासना मनोरथ पूर्ति भी करती है. जानते हैं गायत्री महामंत्र और जप की सरल विधि - - यथासंभव ब्रह्ममुहूर्त यानि सूर्योदय से पहले जागें. स्नान के साथ ही मंत्र जप में पूरी तरह से पवित्रता का ध्यान रखें.
- देवालय में माता गायत्री की पूजा गंध, अक्षत, पीले फूल चढ़ाकर करें। सुगंधित धूप और घी का दीप जलाकर पूरी आस्था और भिक्त से गायत्री मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें -
 
$र्भूभुव:स्व:तत्सवितुर्वरेण्यंभर्गोदेवस्यधीमहिधियोयोन:प्रचोदयात्।
 मंत्र जप के बाद माता गायत्री को यथाशिक्त प्रसाद का भोग लगाएं. माता गायत्री की आरती करें और मंत्र जप, आरती में हुई मन, उच्चारण और विचारों की त्रुटि के लिए क्षमा मांगे. जय जगदेव बाबा की

Sunday, August 7, 2011

पूजा (pooja)

पूजा की प्रकिर्या के तहत क्या क्या आता है

ध्यान - इसके अंतर्गत अपनी सभी इन्द्रियों को अपने अराध्य पर  केन्द्रित किया जाता है
आहवान- अपने ध्यान के माध्यसे अराध्य को बुलाया जाता है
आसन - अपने अराध्य को बैठने के लिए आसन दिया जाता है। इसके बाद अधर्य, आचमन, स्नान, पंचामृत चढ़ाना, पुष्प आदि समर्पित करना, वस्त्र  समर्पित करना, यघ्योपवित, अक्षत समर्पित करना, धूप, अगरबत्ती आदि की खूशबू दिखाना, आभूषण समर्पित करना, प्रतिष्ठापना यानी अपने  अराध्य  की  प्रतिमा एक जगह स्थापित करना और और प्रतिदिन उसकी पूजा करना, अपने अराध्य के नाम का स्मरण १०८ बार करना, दीप जलाना और नेवेध चढ़ाना, मंगल आरती करना, पूजा से सम्बन्धित मन्त्र आदि आते हैं, जो भक्त अपनी श्रद्धा के अनुरूप करता है


 

पूजा का अर्थ (meaning of pooja)

जय माता दी, जय हो जगदेव बाबा की
पूजा संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसे अपने अराध्य की आराधना या भक्ति हेतु प्रयुक्त किया जाता है। पूजा शब्द प और ज से बना है

प- प का अर्थ है पाप यानि हमारे द्वारा किये जाने वाले बुरे कर्म
ज- ज का अर्थ है जन्म से है

पूजा का प सभी बुराइयों का नाश करने वाला है और ज हमारी जिन्दगी को सार्थकता देने वाला है
ईश्वर इतना सूक्ष्म है कि उसे हम अपनी आँखों से देख नही सकतेलेकिन पूजा के माध्यम से हम उसके अस्तित्व अपना ध्यान आराध्य पर केन्द्रित करने के लिए हम अपने समक्ष उसकी तस्वीर रख लेते हैं, ताकि हमारा मन भटके न। किसी के प्रति भक्ति का आधार हमारी आस्था है, तो गलत नहीं है। आस्था किसी को भी पूजनीय बना देता है 
पूजा के द्वारा हम अपने मन में चल रही किसी भी प्रकार की उथल-पुथल को शांत कर अपने अंतर्मन में अच्छे विचारों को जगह देते हैं। प्रतिदिन कुछ समय तक किया गया ध्यान जीवन की सभी समस्याओं को सुलझा देता है वजह यह है कि जब हम अपने अराध्य का ध्यान करते हैं, तो मन शांत होता है और मन में बुरे विचार नही आते। जरूरी नही है कि पूजा करने के लिए मन्दिर में हीं जायें। ईश्वर तो हर किसी के ह्रदय में विधमान हैं। सच्चे मन से कि गई दो मिनट कि पूजा भी भुत होती है। 
जय हो महाबगढ़ देवता की
  जय हो ताडकेश्वर देवता की
   
   

Saturday, August 6, 2011

पढो तो सही।

 गरीब के पास समय ही समय है रोने के लिए क्योंकी सबसे ज्यादा गरीब आदमी ही रोता है ।  इसीलिए  वो  बार-बार प्रभु को याद करता है आमिर व्यक्ति के पास समय नही है वो काम बहुत उलझा हुआ है। उसके पास भक्ति के लिए समय नही है उसके पास आरती के लिए भी समय नही है। इसीलिए वो प्रभु को याद नही कर पाता ये सब इसलिए हो रहा होता है ।  क्योंकी  उसने  पिछले  जन्म  बहुत  पुन्य कमाये हैं। लेकिन वो भूल कर रहा है की अब वो प्रभु को भूल गया है।  

मौन की शक्ति

सभी लोग जानते हैं  धर्म क्या चीज है क्या आप जानते हैं खैर सबसे  पहले बात करेंगे संसार के आस्था वादी लोगो के बारे मैं जो लोग अपने घरों में और दूसरी जगहों पर धर्म का कार्य करवाते हैं और फिर वही लोग दूसरी जगहों पर कुछ असामाजिक कार्य भी करते हैं !

धर्म (dharm)

सभी लोग जानते हैं  धर्म क्या चीज है क्या आप जानते हैं खैर सबसे  पहले बात करेंगे संसार के आस्था वादी लोगो के बारे मैं जो लोग अपने घरों में और दूसरी जगहों पर धर्म का कार्य करवाते हैं और फिर वही लोग दूसरी जगहों पर कुछ असामाजिक कार्य भी करते हैं !
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तारा रानी की कथा

माता के जगराते में महारानी तारा देवी की कथा कहने व सुनने की परम्‍परा प्राचीन काल से चली आई है ।
बिना इस कथा के जागरण को सम्‍पूर्ण नहीं माना जाता है, यद्यपि पुराणों या ऐतिहासिक पुस्‍तकों में कोई उल्‍लेख नहीं है तथापि माता के प्रत्‍येक जागरण में इसको सम्मिलित करने का परम्‍परागत विधान है ।
कथा इस प्रकार है
राजा स्‍पर्श मां भगवती का पुजारी था, दिन रात महामाई की पूजा करता था । मां ने भी उसे राजपाट, धन-दौलत, ऐशो-आराम के सभी साधन दिये था, कमी थी तो सिर्फ यह कि उसके घर में कोई संतान न थी, यही गम उसे दिन-रात सताता, वो मां से यही प्रार्थना करता रहता था कि मां मुझे एक लाल बख्‍श दो, ताकि मैं भी संतान का सुख भोग सकूं, मेरे पीछे भी मेरा नाम लेने वाला हो, मेरा वंश भी चलता रहे, मां ने उसकी पुकार सुन ली, एक दिन मां ने आकर राजा को स्‍वप्‍न में दर्शन दिये और कहा है, हे राजन, मैं तेरी भक्ति से बहुत प्रसन्‍न हूं, और तुझे वरदान देती हूं कि तेरे घर में दो कन्‍याएं जन्‍म लेंगी।
कुछ समय के बाद राजा के घर में एक कन्‍या ने जन्‍म लिया, राजा ने अपने राज दरबारियों को बुलाया, पण्डितों व ज्‍योतिषों को बुलाया और बच्‍ची की जन्‍म कुण्‍डली तैयार करने का हुक्‍म दिया।
पण्डित तथा ज्‍योतिषियों ने उस बच्‍ची की जन्‍म कुण्‍डली तैयार की और कहा हे राजन, यह कन्‍या तो साक्षात देवी है। यह कन्‍या जहां भी कदम रखेगी, वहां खुशियां ही खुशियां होंगी। यह कन्‍या भी भगवती की पुजारिन होगी, उस कन्‍या का नाम तारा रखा गया, थोड़े समय बाद राजा के घर वरदान के अनुसार एक और कन्‍या ने जन्‍म लिया। मंगलवार का दिन था, पण्डितों और ज्‍योतिषियों ने जब जन्‍म कुण्‍डली तैयार की तो उदास हो गये, राजा ने उदासी का करण पूछा तो वे कहने लगे, महाराज यह कन्‍या आपके लिये शुभ नहीं है, राजा ने उदास होकर ज्‍योतिषियों से पूछा कि मैने ऐसे कौन से बुरे कर्म किये हैं जो कि इस कन्‍या ने मेरे घर में जन्‍म लिया है, उस समय ज्‍योतिषियों ने अपनी ज्‍योतिष लगाकर बताया, कहने लगे कि ये दोनो कन्‍याएं जिन्‍होंने आपके घर में जन्‍म लिया है, पिछले जन्‍म में राजा इन्‍द्र की अप्‍सराएं थीं, इन्‍होंने सोचा कि हम भी मृत्‍युलोक में भ्रमण करें तथा देखें कि मृत्‍युलोक पर लोग किस तरह रहते हैं, दोनो ने मृत्‍युलोक पर आ एकादशी का व्रत रखा, बड़ी बहन का नाम तारा था, छोटी बहन का नाम रूक्‍मन, बड़ी बहन तारा ने अपनी छोटी बहन से कहा कि रूक्‍मन आज एकादशी का व्रत है, हम लोगों ने आज भोजन नहीं खाना, तू बाजार जाकर फल ले आ, रूक्‍मन बाजार फल लेने के लिये गई, वहां उसने मछली के पकोड़े बनते देखे। उसने अपने पैसों के तो पकोड़े खा लिये तथा तारा के लिये फल लेकर वापस आ गई, फल उसने तारा को दे दिये, तारा ने पूछा कि तू अपने लिये फल क्‍यों नहीं लाई, तो रूक्‍मन ने बताया कि उसने मछली के पकोड़े खा लिये हैं।
उसी वक्‍त तारा ने शाप दिया, जा नीच, तूने एकादशी के दिन मांस खाया है, नीचों का कर्म किया है, जा मैं तुझे शाप देती हूं, तू नीचों की जून पाये। छिपकली बनकर सारी उम्र मांस ही कीड़े-मकोड़े खाती रहे, उसी शहर में एक ऋषि गुरू गोरख अपने शिष्‍यों के साथ रहते थे, उनके शिष्‍यों में एक चेला तेज स्‍वभाव का तथा घमण्‍डी था, एक दिन वो घमण्‍डी शिष्‍य पानी का कमण्‍डल भरकर खुले स्‍थान में, एकान्‍त में, जाकर तपस्‍या पर बैठ गया, वो अपनी तपस्‍या में लीन था, उसी समय उधर से एक प्‍यासी कपिला गाय आ गई, उस ऋषि के पास पड़े कमण्‍डल में पानी पीने के लिए उसने मुंह डाला और सारा पानी पी गई, जब कपिता गाय ने मुंह बाहर निकाला तो खाली कमण्‍डल की आवाज सुनकर उस ऋषि की समाधि टूटी। उसने देखा कि गाय ने सारा पानी पी लिया था, ऋषि ने गुस्‍से में आ उस कपिला गाय को बहुत बुरी तरह चिमटे से मारा, वह गाय लहुलुहान हो गई, यह खबर गुरू गोरख को मिली, उन्‍होंने जब कपिला गाय की हालत देखी तो उस ऋषि को बहुत बुरा-भला कहा और उसी वक्‍त आश्रम से निकाल दिया, गुरू गोरख ने गाय माता पर किये गये पाप से छुटकारा पाने के लिए कुछ समय बाद एक यज्ञ रचाया, इस यज्ञ का पता उस शिष्‍य को भी चल गया, जिसने कपिला गाय को मारा था, उसने सोचा कि वह अपने अपमान का बदला जरूर लेगा, यज्ञ शुरू हो गया, उस चेले ने एक पक्षी का रूप धारण किया और चोंच में सर्प लेकर भण्‍डारे में फेंक दिया, जिसका किसी को पता न चला, एक छिपकली जो पिछले जन्‍म में तारा देवी की छोटी बहन थी, तथा बहन के शाप को स्‍वीकार कर छिपकली बनी थी सर्प का भण्‍डारे में गिरना देख रही थी, उसे त्‍याग व परोपकार की शिक्षा अब तक याद थी, वह भण्‍डारा होने तक घर की दीवार पर चिपकी समय की प्रतीक्षा करती रही, कई लोगो के प्राण बचाने हेतु उसने अपने प्राण न्‍योछावर कर लेने का मन ही मन निश्‍चय किया, अब खीर भण्‍डारे में दी जाने वाली थी, बांटने वालों की आंखों के सामने वह छिपकली दीवार से कूदकर कढ़ाई में जा गिरी, नादान लोग छिपकली को बुरा-भला कहते हुये खीर की कढ़ाई को खाली करने लगे, उन्‍होंने उसमें मरे हुये सांप को देखा, तब सबको मालूम हुआ कि छिपकली ने अपने प्राण देकर उन सबके प्राणों की रखा की है, उपस्थित सभी सज्‍जनों और देवताओं ने उस छिपकली के लिए प्रार्थना की कि उसे सब योनियों में उत्‍तम मनुष्‍य जन्‍म प्राप्‍त हो तथा अन्‍त में वह मोक्ष को प्राप्‍त करे, तीसरे जन्‍म में वह छिपकली राजा स्‍पर्श के घर कन्‍या जन्‍मी, दूसरी बहन तारा देवी ने फिर मनुष्‍य जन्‍म लेकर तारामती नाम से अयोध्‍या के प्रतापी राजा हरिश्‍चन्‍द्र के साथ विवाह किया।
राजा स्‍पर्श ने ज्‍योतिषियों से कन्‍या की कुण्‍डली बनवाई ज्‍योतिषियों ने राजा को बताया कि कन्‍या आपके लिये हानिकारक सिद्ध होगी, शकुन ठीक नहीं है, अत: आप इसे मरवा दीजिए, राजा बोले लड़की को मारने का पाप बहुत बड़ा है, मैं उस पाप का भार नहीं बन सकता।
तब ज्‍योतिषियों ने विचार करके राय दी, हे राजन । आप एक लकड़ी के सन्‍दूक में ऊपर से सोना-चांदी आदि जड़वा दें, फिर उस सन्‍दूक के भीतर लड़की को बन्‍द करके नदी में प्रवाहित कर दीजिए, सोने चांदी से जड़ा हुआ सन्‍दूक अवश्‍य ही कोई लालच से निकाल लेगा, और आपकी हत्‍या कन्‍या को भी पाल लेगा, आपको किसी प्रकार का पाप न लगेगा, ऐसा ही किया गया और नदी में बहता हुआ सन्‍दूक काशी के समीप एक भंगी को दिखाई दिया वह सन्‍दूक को नदी से बाहर निकाल लाया।
उसने जब सन्‍दूक खोला तो सोने-चांदी के अतिरिक्‍त अत्‍यन्‍त रूपवान कन्‍या दिखाई दी, उस भंगी के कोई संतान नहीं थी, उसने अपनी पत्‍नी को वह कन्‍या लाकर दी तो पत्‍नी की प्रसन्‍नता का ठिकाना न रहा, उसने अपनी संतान के समान ही बच्‍ची को छाती से लगा लिया, भगवती की कृपा से उसके स्‍तनो में दूध उतर आया, पति-पत्‍नी दोनो ने प्रेम से कन्‍या का नाम रूक्‍को रख दिया, रूक्‍को बड़ी हुई उसका विवाह हुआ। रूक्‍को की सास महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर सफाई आदि का काम करने जाया करती थी, एक दिन वह बीमार पड़ गई, रूक्‍को महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र के घर काम करने के लिये पहुंच गई, महाराज की पत्‍नी तारामती ने जब रूक्‍को को देखा तो वह अपने पूर्व जन्‍म के पुण्‍य से उसे पहचान गई, तारामती ने रूक्‍को से कहा हे बहन, तुम मेरे यहां निकट आकर बैठो, महारानी की बात सुनकर रूक्‍को बोली- रानी जी, मैं नीच जाति की भंगिन हूं, भला मैं आपके पास कैसे बैठ सकती हूं ।
तब तारामती ने कहा बहन, पूर्व जन्‍म में तुम मेरी सगी बहन थी, एकादशी का व्रत खंडित करने के कारण तुम्‍हें छिपकली की योनि में जाना पड़ा जो होना था सो हो चुका, अ‍ब तुम अपने इस जन्‍म को सुधारने का उपाय करो तथा भगवती वैष्‍णों माता की सेवा करके अपना जन्‍म सफल बनाओ, यह सुनकर रूक्‍को को बड़ी प्रसन्‍नता हुई और उसने उपाय पूछा, रानी ने बताया कि वैष्‍णों माता सब मनोरथों को पूरा करने वाली हैं, जो लोग श्रद्धापूर्वक माता का पूजन व जागरण करते हैं, उनकी सब मनोकाना पूर्ण होती है ।
रूक्‍को ने प्रसन्‍न होकर माता की मनौती करते हुये कहा हे माता, यदि आपकी कृपा से मुझे एक पुत्र प्राप्‍त हो गया तो मैं भी आपका पूजन व जागरण करवाऊंगी । माता ने प्रार्थना को स्‍वीकार कर लिया, फलस्‍वरूप दसवें महीने उसके गर्भ से एक अत्‍यन्‍त सुन्‍दर बालक ने जन्‍म लिया, परन्‍तु दुर्भाग्‍यवश रूक्‍को को माता का पूजन-जागरण कराने का ध्‍यान न रहा। जब वह बालक पांच वर्ष का हुआ तो एक दिन उसे माता (चेचक) निकल आई । रूक्‍को दु:खी होकर अपने पूर्वजन्‍म की बहन तारामती के पास आई और बच्‍चे की बीमारी का सब वृतान्‍त कह सुनाया। तब तारामती ने कहा तू जरा ध्‍यान करके देख कि तुझसे माता के पूजन में कोई भूल तो नहीं हुई । इस पर रूक्‍को को छह वर्ष पहले की बात याद आ गई। उसने अपराध स्‍वीकार कर लिया, उसने फिर मन में निश्‍चय किया कि बच्‍चे को आराम आने पर जागरण अवश्‍य करवायेगी ।
भगवती की कृपा से बच्‍चा दूसरे दिन ही ठीक हो गया। तब रूक्‍को ने देवी के मन्दिर में ही जाकर पंडित से कहा कि मुझे अपने घर माता का जागरण करना है, अत: आप मंगलवार को मेरे घर पधार कर कृतार्थ करें।
पंडित जी बोले अरी रूक्‍को, तू यहीं पांच रूपये दे जा हम तेरे नाम से मन्दिर में ही जागरण करवा देंगे तू नीच जाति की स्‍त्री है, इसलिए हम तेरे घर में जाकर देवी का जागरण नहीं कर सकते। रूक्‍को ने कहा हे पंडित जी, माता के दरबार में तो ऊंच- नीच का कोई विचार नहीं होता, वे तो सब भक्‍तों पर समान रूप से कृपा करती हैं। अत: आपको कोई एतराज नहीं होना चाहिए। इस पर पंडित ने आपस में विचार करके कहा कि यदि महारानी तुम्‍हारे जागरण में पधारें तब तो हम भी स्‍वीकार कर लेंगे।
यह सुनकर रूक्‍को महारानी के पास गई और सब वृतान्‍त कर सुनाया, तारामती ने जागरण में सम्मिलित होना सहर्ष स्‍वीकार कर लिया, जिस समय रूक्‍को पंडितो से यह कहने के लिये गई महारानी जी जागरण में आवेंगी, उस समय सेन नाई वहां था, उसने सब सुन लिया और महाराजा हरिश्‍चन्‍द्र को जाकर सूचना दी ।
राजा को सेन नाई की बात पर विश्‍वास नहीं हुआ, महारानी भंगियों के घर जागरण में नहीं जा सकती, फिर भी परीक्षा लेने के लिये उसने रात को अपनी उंगली पर थोड़ा सा चीरा लगा लिया जिससे नींद न आए ।
रानी तारामती ने जब देखा कि जागरण का समय हो रहा है, परन्‍तु महाराज को नींद नहीं आ रही तो उसने माता वैष्‍णों देवी से मन ही मन प्रार्थना की कि हे माता, आप किसी उपाय से राजा को सुला दें ताकि मैं जागरण में सम्मिलित हो सकूं ।
राजा को नींद आ गई, तारामती रोशनदान से रस्‍सा बांधकर महल से उतरीं और रूक्‍को के घर जा पहुंची। उस समय जल्‍दी के कारण रानी के हांथ से रेशमी रूमाल तथा पांव का एक कंगन रास्‍ते में ही गिर पड़ा, उधर थोड़ी देर बाद राजा हरिश्‍चन्‍द्र की नींद खुल गई। वह भी रानी का पता लगाने निकल पड़ा। उसने मार्ग में कंगन व रूमाल देखा, राजा ने दोनो चीजें रास्‍ते से उठाकर अपने पास रख लीं और जहां जागरण हो रहा था, वहां जा पहुंचा वह एक कोने में चुपचाप बैठकर दृश्‍य देखने लगा।
जब जागरण समाप्‍त हुआ तो सबने माता की अरदास की, उसके बाद प्रसाद बांटा गया, रानी तारामती को जब प्रसाद मिला तो उसने झोली में रख लिया।
यह देख लोगों ने पूछा आपने प्रसाद क्‍यों नहीं खाया ?
यदि आप न खाएंगी तो कोई भी प्रसाद नहीं खाएगा, रानी बोली- तुमने प्रसाद दिया, वह मैने महाराज के लिए रख लिया, अब मुझे मेरा प्रसाद दे दें, अबकी बार प्रसाद ले तारा ने खा लिया, इसके बाद सब भक्‍तों ने मां का प्रसाद खाया, इस प्रकार जागरण समाप्‍त करके, प्रसाद खाने के पश्‍चात् रानी तारामती महल की तरफ चलीं।
तब राजा ने आगे बढ़कर रास्‍ता रोक लिया, और कहा- तूने नीचों के घर का प्रसाद खा अपना धर्म भ्रष्‍ट कर लिया, अब मैं तुझे अपने घर कैसे रखूं ? तूने तो कुल की मर्यादा व प्रतिष्‍ठा का भी ध्‍यान नहीं रखा, जो प्रसाद तू अपनी झोली में मेरे लिये लाई है, उसे खिला मुझे भी तू अपवित्र करना चाहती है।
ऐसा कहते हुऐ जब राजा ने झोली की ओर देखा तो भगवती की कृपा से प्रसाद के स्‍थान पर उसमें चम्‍पा, गुलाब, गेंदे के फूल, कच्‍चे चावल और सुपारियां दिखाई दीं यह चमत्‍कार देख राजा आश्‍चर्यचकित रह गया, राजा हरिश्‍चन्‍द्र रानी तारा को साथ ले महल लौट आए, वहीं रानी ने ज्‍वाला मैया की शक्ति से बिना माचिस या चकमक पत्‍थर की सहायता के राजा को अग्नि प्रज्‍वलित करके दिखाई, जिसे देखकर राजा का आश्‍चर्य और बढ़ गया।
रानी बोली प्रत्‍यक्ष दर्शन पाने के लिऐ बहुत बड़ा त्‍याग होना चाहिए, यदि आप अपने पुत्र रोहिताश्‍व की बलि दे सकें तो आपको दुर्गा देवी के प्रत्‍यक्ष दर्शन हो जाएंगे। राजा के मन में तो देवी के दर्शन की लगन हो गई थी, राजा ने पुत्र मोह त्‍याग‍कर रोहिताश्‍व का सिर देवी को अर्पण कर दिया, ऐसी सच्‍ची श्रद्धा एवं विश्‍वास देख दुर्गा माता, सिंह पर सवार हो उसी समय प्रकट को गईं और राजा हरिश्‍चन्‍द्र दर्शन करके कृतार्थ हो गए, मरा हुआ पुत्र भी जीवित हो गया।
चमत्‍कार देख राजा हरिश्‍चन्‍द्र गदगद हो गये, उन्‍होंने विधिपूर्वक माता का पूजन करके अपराधों की क्षमा मांगी।
इसके बाद सुखी रहने का आशीर्वाद दे माता अन्‍तर्ध्‍यान हो गईं। राजा ने तारा रानी की भक्ति की प्रशंसा करते हुऐ कहा हे तारा तुम्‍हारे आचरण से अति प्रसन्‍न हूं। मेरे धन्‍य भाग, जो तुम मुझे पत्‍नी रूप में प्राप्‍त हुई।
आयुपर्यन्‍त सुख भोगने के पश्‍चात् राजा हरिश्‍चन्‍द्र, रानी तारा एवं रूक्‍मन भंगिन तीनों ही मनुष्‍य योनि से छूटकर देवलोक को प्राप्‍त हुये।
माता के जागरण में तारा रानी की कथा को जो मनुष्‍य भक्तिपूर्वक पढ़ता या सुनता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, सुख-समृद्धि बढ़ती है, शत्रुओं का नाश होता है।
इस कथा के बिना माता का जागरण पूरा नहीं माना जाता ।
।। बोलो सांचे दरबार की जय ।।

जन्म और मृत्यु ।

शारीर को चाहे कितना भी मान मिले, सुविधा मिले एक दिन  तो वह जल ही जायेगा । मौत  के बाद  शरीर जला दिया जाय उसके पहले शरीर को चेतना देने वाली चेतन्य परमात्मा को पाने की इच्छा पैदा हो जाये तो कल्याण हो जाये। 
             बुद्ध अपने भिक्षुको को अक्सर यह बात सुनाते थे-- 'तुम जो यह अपने सामने लहराता सरोवर देख रहे हो, अगर तुम्हारे हर जन्म के आंसूं इक्ट्ठे किये जाएँ तो यह सरोवर भी  छोटा पड़ जायेगा, तुम इतने जन्मो से आंसू बहाते आये हो और अगर तुम्हारे अब तक के जन्मो के शरीरों की  हड्डियाँ इक्कठी की जाएँ तो सुमेरु पर्वत भी छोटा पड जाय, इतने युगों से तुम भटकते आये हो।  
             हर जन्म में तुमने सोचा होगा, 'यह माकन मेरा है, यह दुकान मेरी है, ये मेरे सगे सम्बन्धी हैं' परन्तु मृत्यु का एक झटका सब पराया कर देता है। इसलिए हेd भिक्षुओं अब तुम मोक्ष मार्ग का अवलम्बन लेकर मुक्ति का अनुभव करो, जहाँ बंधन नही है, जिसे पाने के बाद फिर छिना नही जा सकता 
वह मोक्ष सम्पदा पाने का यतन करो ।
              यह जो शरीर मिला है वह छीन लिया जायेगा पर शरीर जाने के बाद भी तुम रहते हो। शरीर बनने के पहले भी तुम थे। जीवन में सुख-दुःख आते हैं। सुख-दुःख आने के पहले भी तुम रहते हो और सुख-दुःख चले जाने के बाद भी तुम रहते हो। सुख-दुःख आये और चले गये, उनको देखने वाले हम हैं। जय जगदेव बाबा की।





Monday, July 18, 2011

मानव जीवन का रहस्य


हमारे धर्मग्रंथ तथा धर्माचार्य यही उपदेश देते हैं की मानव जीवन दुर्लभ है अत:  उसका  सदुपयोग  बड़ी सजगता से किया जाना चाहिए। मानव शरीर को अति दुर्लभ इसलिए बतलाया गया है  क्योंकि  यह  हमें  अनायास ही नही मिला है बल्कि हमारे अनन्तानन्त पूर्व जन्मों के  पुण्य कर्मोसंस्कारों तथा इश्वर की अहैतुकी कृपा के फल स्वरुप प्राप्त हुआ है। धर्म शाश्त्र बतलाते हैं कि यह शरीर हमें चोरासी लाख योनियों कि यात्रा पूर्ण करने के पश्चात् उपलब्ध हुआ है। यह भी कहा गया है कि चोरासी लाख योनियों का एक चक्र  ,४०,००,०००  अर्थात  (आठ करोड़ चालीस लाख) वर्ष  में पूरा होता है। 
              संत महात्मा कहते हैं कि देव योनी भोग योनी है अर्थात पुन्य कर्मो में भोग पूरे होने के बाद फिर योनियों में जाना पड़ता है। देव योनी में कोई नया शुभ कर्म नही किया जा सकता। यही कारण है कि  देवता भी मनुष्य शरीर के लिए लालायित रहते हैं। केवल मनुष्य योनी ही इसी योनी  है जिसमें  जीवात्मा  पूर्व जन्मों के कर्मो का भोग करने के साथ-२ नये शुभ कर्म करके परमपद अर्थात मोक्ष का  अधिकारी बन सकता है।       

दो पेरवाला मनुष्य तो कहलाता है पर जो मन से उस चेतन्य परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़ ले वही सच्चे अर्थ में मनुष्य है। गधा, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली या संसार में उलझनेवाले भोगी व्यक्ति  ने अपना  मनुष्यता का अधिकार खो दिया है। जिसका मन परमात्मतत्व से, परमात्मज्ञान से, परमात्माधुर्य से जुड़ा है- ऐसे व्यक्ति को शास्त्रीय भाषा में मनुष्य कहा गया है।
             आहार लेना, नींद करना, मुसीबत आये तो भयभीत हो जाना और संसारी भोग भोगना- वे सब तो मनुष्य और पशु दोनों कर लेते हैं, पर एक धर्म, एक बड़ा भारी सदगुण मनुष्य में है की वह अपना मन परमात्मा में लगा सकता है। इसीलिए मनुष्य में मनुष्यत्व  आता है नही तो  मनुष्य  होते  हुए भी द्विपाद पशु ही  है। मनुष्यत्व आना,   फिर  मोक्ष की  इच्छा  होना यानी सब दुखो से सदा के लिये छूटने की इच्छा, निर्बल नरायण को पाने की इच्छाजैसे  किसी का गला पकड़कर उसे पानी में डुबाया जाय तो उस समय वह बहार निकलने के सिवाय और कुछ नहीं चाहता है, ऐसे ही संसार के दुखों से, बन्धनों से, कष्टों से मुसीबतों सेअज्ञानांधकार व जन्म-मरण के दुखों से बाहर निकलने कीछूटने की इच्छा हो तो उसे मुमुक्षुत्व कहते हैं।   

                                                        भगवान राम सबका भला करे जय हो जगदेव बाबा की