शारीर को चाहे कितना भी मान मिले, सुविधा मिले एक दिन तो वह जल ही जायेगा । मौत के बाद शरीर जला दिया जाय उसके पहले शरीर को चेतना देने वाली चेतन्य परमात्मा को पाने की इच्छा पैदा हो जाये तो कल्याण हो जाये।
बुद्ध अपने भिक्षुको को अक्सर यह बात सुनाते थे-- 'तुम जो यह अपने सामने लहराता सरोवर देख रहे हो, अगर तुम्हारे हर जन्म के आंसूं इक्ट्ठे किये जाएँ तो यह सरोवर भी छोटा पड़ जायेगा, तुम इतने जन्मो से आंसू बहाते आये हो और अगर तुम्हारे अब तक के जन्मो के शरीरों की हड्डियाँ इक्कठी की जाएँ तो सुमेरु पर्वत भी छोटा पड जाय, इतने युगों से तुम भटकते आये हो।
हर जन्म में तुमने सोचा होगा, 'यह माकन मेरा है, यह दुकान मेरी है, ये मेरे सगे सम्बन्धी हैं' परन्तु मृत्यु का एक झटका सब पराया कर देता है। इसलिए हेd भिक्षुओं अब तुम मोक्ष मार्ग का अवलम्बन लेकर मुक्ति का अनुभव करो, जहाँ बंधन नही है, जिसे पाने के बाद फिर छिना नही जा सकता
वह मोक्ष सम्पदा पाने का यतन करो ।
यह जो शरीर मिला है वह छीन लिया जायेगा पर शरीर जाने के बाद भी तुम रहते हो। शरीर बनने के पहले भी तुम थे। जीवन में सुख-दुःख आते हैं। सुख-दुःख आने के पहले भी तुम रहते हो और सुख-दुःख चले जाने के बाद भी तुम रहते हो। सुख-दुःख आये और चले गये, उनको देखने वाले हम हैं। जय जगदेव बाबा की।
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