जय माता दी, जय हो जगदेव बाबा की।
पूजा संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसे अपने अराध्य की आराधना या भक्ति हेतु प्रयुक्त किया जाता है। पूजा शब्द प और ज से बना है।प- प का अर्थ है पाप यानि हमारे द्वारा किये जाने वाले बुरे कर्म।
ज- ज का अर्थ है जन्म से है।
पूजा का प सभी बुराइयों का नाश करने वाला है और ज हमारी जिन्दगी को सार्थकता देने वाला है।
ईश्वर इतना सूक्ष्म है कि उसे हम अपनी आँखों से देख नही सकते। लेकिन पूजा के माध्यम से हम उसके अस्तित्व अपना ध्यान आराध्य पर केन्द्रित करने के लिए हम अपने समक्ष उसकी तस्वीर रख लेते हैं, ताकि हमारा मन भटके न। किसी के प्रति भक्ति का आधार हमारी आस्था है, तो गलत नहीं है। आस्था किसी को भी पूजनीय बना देता है।
पूजा के द्वारा हम अपने मन में चल रही किसी भी प्रकार की उथल-पुथल को शांत कर अपने अंतर्मन में अच्छे विचारों को जगह देते हैं। प्रतिदिन कुछ समय तक किया गया ध्यान जीवन की सभी समस्याओं को सुलझा देता है वजह यह है कि जब हम अपने अराध्य का ध्यान करते हैं, तो मन शांत होता है और मन में बुरे विचार नही आते। जरूरी नही है कि पूजा करने के लिए मन्दिर में हीं जायें। ईश्वर तो हर किसी के ह्रदय में विधमान हैं। सच्चे मन से कि गई दो मिनट कि पूजा भी भुत होती है।
जय हो महाबगढ़ देवता की।
जय हो ताडकेश्वर देवता की।
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