द्वारका गुजरात के देवभूमि द्वारका जिले में स्थित एक नगर तथा हिन्दू तीर्थस्थल है।[1] यह हिन्दुओं के साथ सर्वाधिक पवित्र तीर्थों में से एक तथा चार धामों में से एक है। यह सात पुरियों में एक पुरी है।[2] जिले का नाम द्वारका पुरी से रखा गया है जीसकी रचना २०१३ में की गई
थी। यह नगरी भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी है। हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार, भगवान कॄष्ण ने इसे बसाया था। यह श्रीकृष्ण की कर्मभूमि है।
आधुनिक द्वारका एक शहर है। कस्बे के
एक हिस्से के चारों ओर चहारदीवारी खिंची है इसके भीतर ही सारे बड़े-बड़े मन्दिर है।
काफी समय से जाने-माने शोधकर्ताओं ने पुराणों में वर्णित द्वारिका के रहस्य का पता
लगाने का प्रयास किया, लेकिन
वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित कोई भी अध्ययन कार्य अभी तक पूरा नहीं किया गया है। 2005 में द्वारिका के रहस्यों से पर्दा
उठाने के लिए अभियान शुरू किया गया था। इस अभियान में भारतीय नौसेना ने भी मदद
की।अभियान के दौरान समुद्र की गहराई में कटे-छटे पत्थर मिले और यहां से लगभग 200 अन्य नमूने भी एकत्र किए, लेकिन आज तक यह तय नहीं हो पाया कि यह
वही नगरी है अथवा नहीं जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने बसाया था। आज भी यहां वैज्ञानिक
स्कूबा डायविंग के जरिए समंदर की गहराइयों में कैद इस रहस्य को सुलझाने में लगे
हैं।
कृष्ण मथुरा में उत्पन्न हुए, गोकुल में पले, पर राज उन्होने द्वारका में ही किया।
यहीं बैठकर उन्होने सारे देश की बागडोर अपने हाथ में संभाली। पांड़वों को सहारा
दिया। धर्म की जीत कराई और, शिशुपाल
और दुर्योधन जैसे अधर्मी राजाओं को मिटाया। द्वारका उस जमाने में राजधानी बन गई
थीं। बड़े-बड़े राजा यहां आते थे और बहुत-से मामले में भगवान कृष्ण की सलाह लेते
थे। इस जगह का धार्मिक महत्व तो है ही, रहस्य भी कम नहीं है। कहा जाता है कि
कृष्ण की मृत्यु के साथ उनकी बसाई हुई यह नगरी समुद्र में डूब गई। आज भी यहां उस
नगरी के अवशेष मौजूद हैं।
गोमती द्वारका
द्वारका के दक्षिण में एक लम्बा ताल है। इसे 'गोमती तालाब' कहते है। इसके नाम पर ही द्वारका को गोमती द्वारका कहते है।
निष्पाप कुण्ड
इस गोमती तालाब के ऊपर नौ घाट है। इनमें
सरकारी घाट के पास एक कुण्ड है, जिसका नाम
निष्पाप कुण्ड है। इसमें गोमती का पानी भरा रहता है। नीचे उतरने के लिए पक्की सीढ़िया
बनी है। यात्री सबसे पहले इस निष्पाप कुण्ड में नहाकर अपने को शुद्ध करते है।
बहुत-से लोग यहां अपने पुरखों के नाम पर पिंड-दान भी करतें हैं।
रणछोड़ जी मंदिर
द्वारकाधीश मंदिर
गोमती के दक्षिण में पांच कुंए है। निष्पाप
कुण्ड में नहाने के बाद यात्री इन पांच कुंओं के पानी से कुल्ले करते है। तब
रणछोड़जी के मन्दिर की ओर जाते है। रास्तें में कितने ही छोटे मन्दिर पड़ते
है-कृष्णजी,
गोमती माता और महालक्ष्मी के मन्दिर।
रणछोड़जी का मन्दिर द्वारका का सबसे बड़ा और सबसे बढ़िया मन्दिर है। भगवान कृष्ण
को उधर रणछोड़जी कहते है। सामने ही कृष्ण भगवान की चार फुट ऊंची मूर्ति है। यह
चांदी के सिंहासन पर विराजमान है। मूर्ति काले पत्थर की बनी है। हीरे-मोती इसमें
चमचमाते है। सोने की ग्यारह मालाएं गले में पड़ी है। कीमती पीले वस्त्र पहने है।
भगवान के चार हाथ है। एक में शंख है, एक में सुदर्शन चक्र है। एक में गदा और एक में कमल का फूल। सिर पर सोने का
मुकुट है। लोग भगवान की परिक्रमा करते है और उन पर फूल और तुलसी दल चढ़ाते है।
चौखटों पर चांदी के पत्तर मढ़े है। मन्दिर की छत में बढ़िया-बढ़िया कीमती
झाड़-फानूस लटक रहे है। एक तरफ ऊपर की मंमें जाने के लिए सीढ़िया है। पहली मंजिल
में अम्बादेवी की मूर्ति है-ऐसी सात मंजिले है और कुल मिलाकर यह मन्दिर एक सौ
चालीस फुट ऊंचा है। इसकी चोटी आसमान से बातें करती है।
जय श्री कृष्णा जय श्री रणछोड़राय
गुजरात के डाकोर का रणछोड़ राय मंदिर
शेधी नदी के तट पर बसा यह तीर्थस्थल रणछोडजी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। अभी का विद्यमान मंदिर सन १७७२ में बनाया गया है। इस स्थान की गिनती हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थानों में की जाती है।"डाकोरजी के रणछोड़जी मंदिर के नामकरण के पीछे भी एक कथा है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण और जरासंध के बीच भीषण युद्ध हुआ था। तब श्रीकृष्ण अपने अनुचरों की प्राणरक्षा के लिए युद्ध छोड़कर भाग गए थे और उन्होंने यहाँ शरण ली थी। इस अनुश्रुति के कारण इस मंदिर का नाम रणछोड़जी पड़ गया।"
अति सुंदर और कलात्मक शिल्पकृतिर्यासे संपन्न यह मंदिर अति विशाल है। यहाँ पुराने जमाने में श्रीकृष्ण के परमभक्त बोडाना रहा करते थे, बोडानाजी की प्रार्थना सुनकर प्रभु द्वारिकासे डाकोर में प्रतिमारूप बनकर आ गये थे तभी से प्रभु यहाँ रणछोडरायजी के नामसे पूजे जाते हैं। हर माह पूर्णिमा के अवसर पर हजारों भक्त यात्री जय रणछोड के ध्वनिके साथ धजा लेकर इस मंदिर में दर्शन हेतु आते हैं। साल में एकबार हर फाल्गुन पूर्णिमां पर यहाँ बहुत बडा मेला लगता है।
भक्तों के लिए रणछोड़ मंदिर का महत्व वैसा ही है, जैसा द्वारिका स्थित द्वारिकाधीश मंदिर का। दोनों ही मंदिरों में कृष्ण भगवान की मूर्तियाँ भी श्याम रंग के पत्थर से ही बनाई गई हैं। श्याम रूप में श्यामसुंदर का रूप बेहद मनोहर लगता है। गोमती नदी के किनारे इस मंदिर का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है। ऊपरी गुंबद में स्वर्ण का आवरण चढ़ाया गया है। यहाँ पहुँचकर महसूस होता है, जैसे आप कृष्ण की नगरी में आ गए हों। हर तरफ हरे कृष्णा ध्वनि का मधुर नाद होता रहता है।
यह मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है और शाम 4 से 7 बजे तक इसके द्वार खुले रहते हैं। प्रतिदिन सुबह 6:45 बजे यहाँ मंगल आरती का आयोजन होता है। इस मंगल आरती को मंगलभोग, बालभोग, श्रीनगरभोग, ग्वालभोग और राजभोग द्वारा संपन्न किया जाता है, जबकि दोपहर में यह उस्थापनभोग, शयनभोग और शक्तिभोग द्वारा सम्पन्न किया जाता है।
प्रत्येक वर्ष विशेषकर पूर्णिमा के अवसर पर लाखों की तादाद में श्रद्धालु डाकोर में दर्शन के लिए आते हैं। डाकोर में मुख्य उत्सव कार्तिक, चैत्र, फागुन और आश्विन पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित किए जाते हैं। इस समय मंदिर में एक लाख से भी अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
भगवान श्री कृष्ण अपने परमभक्त बोडानाजी के प्रति अति प्रसन्न थे। अपनी हथैलियाँमें तुलसी लेकर श्रीकृष्णको अर्पण करने हेतु बोडानाजी डाकोर से पैदल द्वारिका नियमित रूप से हरसाल जाते थे। उनकी वृध्धावस्था तक यहाँ सिलसिला चालु रहा, वयकी कमजोरी से बोडानाजी का द्वारिका जाना कठीन होने लगा, प्रभु तो अंतर्यामी थे भक्त के प्रेमी भी थे सोचा चलो इस साल तुलसीपत्र स्वीकारने मैं ही खुद बोडानाजी के पास क्यो न चलु? प्रसन्न हुऐ प्रभु, और विक्रम संवत १२१२ (सन ११५६) कार्तिक सुद-१ (देव-दिवाली) के दिन वे द्वारिका से डाकोर में प्रगट हुए। प्रिय भक्त बोडानाजी से तुलसीपत्र डाकोरमें स्वीकार किये। कहा जाता है कि सुवर्ण शिलाओंसे न तुलनेवाले प्रभुने मात्र तुलसीपत्र के सामने अपना वजन कम कर देना भक्तप्रेममें मुनासिब माना। उन तुलास्थान अबभी गोमती तालाब पर प्रतिकृती से अस्तित्वमें है।
नजदिकका भूमि मार्ग:
गांधीनगर से डाकोर १२५ कि.मी.
बडोदरा से डाकोर १०४ कि.मी.
अहमदाबाद से डाकोर ९५ कि.मी.
जय श्री कृष्णा जय श्री रणछोड़राय
गुजरात के डाकोर का रणछोड़ राय मंदिर
शेधी नदी के तट पर बसा यह तीर्थस्थल रणछोडजी के मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। अभी का विद्यमान मंदिर सन १७७२ में बनाया गया है। इस स्थान की गिनती हिंदुओं के पवित्र तीर्थस्थानों में की जाती है।"डाकोरजी के रणछोड़जी मंदिर के नामकरण के पीछे भी एक कथा है। माना जाता है कि श्रीकृष्ण और जरासंध के बीच भीषण युद्ध हुआ था। तब श्रीकृष्ण अपने अनुचरों की प्राणरक्षा के लिए युद्ध छोड़कर भाग गए थे और उन्होंने यहाँ शरण ली थी। इस अनुश्रुति के कारण इस मंदिर का नाम रणछोड़जी पड़ गया।"
अति सुंदर और कलात्मक शिल्पकृतिर्यासे संपन्न यह मंदिर अति विशाल है। यहाँ पुराने जमाने में श्रीकृष्ण के परमभक्त बोडाना रहा करते थे, बोडानाजी की प्रार्थना सुनकर प्रभु द्वारिकासे डाकोर में प्रतिमारूप बनकर आ गये थे तभी से प्रभु यहाँ रणछोडरायजी के नामसे पूजे जाते हैं। हर माह पूर्णिमा के अवसर पर हजारों भक्त यात्री जय रणछोड के ध्वनिके साथ धजा लेकर इस मंदिर में दर्शन हेतु आते हैं। साल में एकबार हर फाल्गुन पूर्णिमां पर यहाँ बहुत बडा मेला लगता है।
भक्तों के लिए रणछोड़ मंदिर का महत्व वैसा ही है, जैसा द्वारिका स्थित द्वारिकाधीश मंदिर का। दोनों ही मंदिरों में कृष्ण भगवान की मूर्तियाँ भी श्याम रंग के पत्थर से ही बनाई गई हैं। श्याम रूप में श्यामसुंदर का रूप बेहद मनोहर लगता है। गोमती नदी के किनारे इस मंदिर का निर्माण सफेद संगमरमर से किया गया है। ऊपरी गुंबद में स्वर्ण का आवरण चढ़ाया गया है। यहाँ पहुँचकर महसूस होता है, जैसे आप कृष्ण की नगरी में आ गए हों। हर तरफ हरे कृष्णा ध्वनि का मधुर नाद होता रहता है।
यह मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक खुला रहता है और शाम 4 से 7 बजे तक इसके द्वार खुले रहते हैं। प्रतिदिन सुबह 6:45 बजे यहाँ मंगल आरती का आयोजन होता है। इस मंगल आरती को मंगलभोग, बालभोग, श्रीनगरभोग, ग्वालभोग और राजभोग द्वारा संपन्न किया जाता है, जबकि दोपहर में यह उस्थापनभोग, शयनभोग और शक्तिभोग द्वारा सम्पन्न किया जाता है।
प्रत्येक वर्ष विशेषकर पूर्णिमा के अवसर पर लाखों की तादाद में श्रद्धालु डाकोर में दर्शन के लिए आते हैं। डाकोर में मुख्य उत्सव कार्तिक, चैत्र, फागुन और आश्विन पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित किए जाते हैं। इस समय मंदिर में एक लाख से भी अधिक श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।
भगवान श्री कृष्ण अपने परमभक्त बोडानाजी के प्रति अति प्रसन्न थे। अपनी हथैलियाँमें तुलसी लेकर श्रीकृष्णको अर्पण करने हेतु बोडानाजी डाकोर से पैदल द्वारिका नियमित रूप से हरसाल जाते थे। उनकी वृध्धावस्था तक यहाँ सिलसिला चालु रहा, वयकी कमजोरी से बोडानाजी का द्वारिका जाना कठीन होने लगा, प्रभु तो अंतर्यामी थे भक्त के प्रेमी भी थे सोचा चलो इस साल तुलसीपत्र स्वीकारने मैं ही खुद बोडानाजी के पास क्यो न चलु? प्रसन्न हुऐ प्रभु, और विक्रम संवत १२१२ (सन ११५६) कार्तिक सुद-१ (देव-दिवाली) के दिन वे द्वारिका से डाकोर में प्रगट हुए। प्रिय भक्त बोडानाजी से तुलसीपत्र डाकोरमें स्वीकार किये। कहा जाता है कि सुवर्ण शिलाओंसे न तुलनेवाले प्रभुने मात्र तुलसीपत्र के सामने अपना वजन कम कर देना भक्तप्रेममें मुनासिब माना। उन तुलास्थान अबभी गोमती तालाब पर प्रतिकृती से अस्तित्वमें है।
नजदिकका भूमि मार्ग:
गांधीनगर से डाकोर १२५ कि.मी.
बडोदरा से डाकोर १०४ कि.मी.
अहमदाबाद से डाकोर ९५ कि.मी.
परिक्रमा
रणछोड़जी के दर्शन के बाद मन्दिर की परिक्रमा
की जाती है। मन्दिर की दीवार दोहरी है। दो दावारों के बीच इतनी जगह है कि आदमी समा
सके। यही परिक्रमा का रास्ता है। रणछोड़जी के मन्दिर के सामने एक बहुत लम्बा-चौड़ा
१०० फुट ऊंचा जगमोहन है। इसकी पांच मंजिलें है और इसमें ६० खम्बे है। रणछोड़जी के
बाद इसकी परिक्रमा की जाती है। इसकी दीवारे भी दोहरी है।
दुर्वासा और त्रिविक्रम मंदिर
दक्षिण की तरफ बराबर-बराबर दो मंदिर है। एक
दुर्वासाजी का और दूसरा मन्दिर त्रिविक्रमजी को टीकमजी कहते है। इनका मन्दिर भी
सजा-धजा है। मूर्ति बड़ी लुभावनी है। और कपड़े-गहने कीमती है। त्रिविक्रमजी के
मन्दिर के बाद प्रधुम्नजी के दर्शन करते हुए यात्री इन कुशेश्वर भगवान के मन्दिर
में जाते है। मन्दिर में एक बहुत बड़ा तहखाना है। इसी में शिव का लिंग है और
पार्वती की मूर्ति है।
कुशेश्वर मंदिर
कुशेश्वर शिव के मन्दिर के बराबर-बराबर
दक्षिण की ओर छ: मन्दिर और है। इनमें अम्बाजी और देवकी माता के मन्दिर खास हैं।
रणछोड़जी के मन्दिर के पास ही राधा, रूक्मिणी,
सत्यभामा और जाम्बवती के छोटे-छोटे मन्दिर
है। इनके दक्षिण में भगवान का भण्डारा है और भण्डारे के दक्षिण में शारदा-मठ है।
शारदा-मठ
शारदा-मठ को आदि गुरू शंकराचार्य ने बनबाया था। उन्होने पूरे देश के चार कोनों
मे चार मठ बनायें थे। उनमें एक यह शारदा-मठ है। परंपरागत रुप से आज भी शंकराचार्य
मठ के अधिपति है। भारत में सनातन धर्म के अनुयायी शंकराचार्य का सम्मान करते है। [3] रणछोड़जी के मन्दिर से द्वारका शहर की
परिक्रमा शुरू होती है। पहले सीधे गोमती के किनारे जाते है। गोमती के नौ घाटों पर
बहुत से मन्दिर है- सांवलियाजी का मन्दिर, गोवर्धननाथजी का मन्दिर, महाप्रभुजी की
बैठक।
हनुमान मंदिर
आगे वासुदेव घाट पर हनुमानजी का मन्दिर है।
आखिर में संगम घाट आता है। यहां गोमती समुद्र से मिलती है। इस संगम पर
संगम-नारायणजी का बहुत बड़ा मन्दिर है।
चक्र तीर्थ
संगम-घाट के
उत्तर में समुद्र के ऊपर एक ओर घाट है। इसे चक्र तीर्थ कहते है। इसी के पास
रत्नेश्वर महादेव का मन्दिर है। इसके आगे सिद्धनाथ महादेवजी है, आगे एक बावली है, जिसे ‘ज्ञान-कुण्ड’
कहते है। इससे आगे जूनीराम बाड़ी है, जिससे, राम,
लक्ष्मण और सीता की मूर्तिया है। इसके बाद एक
और राम का मन्दिर है,
जो नया बना है। इसके बाद एक बावली है, जिसे सौमित्री बावली यानी लक्ष्मणजी की बावजी
कहते है। काली माता और आशापुरी माता की मूर्तिया इसके बाद आती है।
कैलाश कुण्ड
इनके आगे यात्री कैलासकुण्ड़ पर पहुंचते है। इस कुण्ड का
पानी गुलाबी रंग का है। कैलासकुण्ड के आगे सूर्यनारायण का मन्दिर है। इसके आगे
द्वारका शहर का पूरब की तरफ का दरवाजा पड़ता है। इस दरवाजे के बाहर जय और विजय की
मूर्तिया है। जय और विजय बैकुण्ठ में भगवान के महल के चौकीदार है। यहां भी ये
द्वारका के दरवाजे पर खड़े उसकी देखभाल करते है। यहां से यात्री फिर निष्पाप कुण्ड
पहुंचते है और इस रास्ते के मन्दिरों के दर्शन करते हुए रणछोड़जी के मन्दिर में
पहुंच जाते है। यहीं परिश्रम खत्म हो जाती है। यही असली द्वारका है। इससे बीस मील
आगे कच्छ की खाड़ी में एक छोटा सा टापू है। इस पर बेट-द्वारका बसी है। गोमती
द्वारका का तीर्थ करने के बाद यात्री बेट-द्वारका जाते है। बेट-द्वारका के दर्शन
बिना द्वारका का तीर्थ पूरा नही होता। बेट-द्वारका पानी के रास्ते भी जा सकते है
और जमीन के रास्ते भी।
गोपी तालाब
जमीन के रास्ते जाते हुए तेरह मील आगे
गोपी-तालाब पड़ता है। यहां की आस-पास की जमीन पीली है। तालाब के अन्दर से भी रंग
की ही मिट्टी निकलती है। इस मिट्टी को वे गोपीचन्दन कहते है। यहां मोर बहुत होते
है। गोपी तालाब से तीन-मील आगे नागेश्वर नाम का शिवजी और पार्वती का छोटा सा
मन्दिर है। यात्री लोग इसका दर्शन भी जरूर करते है।कहते है, भगवान कृष्ण इस बेट-द्वारका नाम के टापू पर अपने घरवालों के साथ
सैर करने आया करते थे। यह कुल सात मील लम्बा है। यह पथरीला है। यहां कई अच्छे और
बड़े मन्दिर है। कितने ही तालाब है। कितने ही भंडारे है। धर्मशालाएं है और
सदावर्त्त लगते है। मन्दिरों के सिवा समुद्र के किनारे घूमना बड़ा अच्छा लगता है।
बेट द्वारका
बेट-द्वारका ही वह जगह है, जहां भगवान कृष्ण ने अपने प्यारे भगत
नरसी की हुण्डी भरी थी। बेट-द्वारका के टापू[4] का पूरब की तरफ का जो कोना है, उस पर हनुमानजी का बहुत बड़ा मन्दिर
है। इसीलिए इस ऊंचे टीले को हनुमानजी का टीला कहते है। आगे बढ़ने पर गोमती-द्वारका
की तरह ही एक बहुत बड़ी चहारदीवारी यहां भी है। इस घेरे के भीतर पांच बड़े-बड़े
महल है। ये दुमंजिले और तिमंजले है। पहला और सबसे बड़ा महल श्रीकृष्ण का महल है।
इसके दक्षिण में सत्यभामा और जाम्बवती के महल है। उत्तर में रूक्मिणी और राधा के
महल है। इन पांचों महलों की सजावट ऐसी है कि आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। इन
मन्दिरों के किबाड़ों और चौखटों पर चांदी के पतरे चढ़े हैं। भगवान कृष्ण और उनकी
मूर्ति चारों रानियों के सिंहासनों पर भी चांदी मढ़ी है। मूर्तियों का सिंगार बड़ा
ही कीमती है। हीरे, मोती और
सोने के गहने उनको पहनाये गए हैं। सच्ची जरी के कपड़ों से उनको सजाया गया है।
चौरासी धुना - भेंट द्वारका टापू में भगवान द्वारकाधीश के मंदिर से ७ कि॰मी॰ की दूरी पर चौरासी धुना नामक एक
प्राचीन एवं एतिहासिक तीर्थ स्थल है| उदासीन संप्रदाय के सुप्रसिद्ध संत और प्रख्यात इतिहास लेखक, निर्वाण थडा तीर्थ, श्री पंचयाती अखाडा बड़ा उदासीन के
पीठाधीश्वर महंत योगिराज डॉ॰ बिंदुजी महाराज "बिंदु" के अनुसार
ब्रह्माजी के चारों मानसिक पुत्रो सनक, सनंदन, सनतकुमार और सनातन ने ब्रह्माजी की
श्रृष्टि-संरचना की आज्ञा को न मानकर उदासीन संप्रदाय की स्थापना की और मृत्यु-लोक
में विविध स्थानों पर भ्रमण करते हुए भेंट द्वारका में भी आये| उनके साथ उनके अनुयायियों के रूप में
अस्सी (८०) अन्य संत भी साथ थें| इस प्रकार चार सनतकुमार और ८० अनुयायी उदासीन संतो को जोड़कर
८४ की संख्या पूर्ण होती है| इन्ही ८४ आदि दिव्य उदासीन संतो ने यहाँ पर चौरासी धुने
स्थापित कर साधना और तपस्चर्या की और ब्रह्माजी को एक एक धुने की एकलाख महिमा को
बताया, तथा
चौरासी धुनो के प्रति स्वरुप चौरासी लाख योनिया निर्मित करने का सांकेतिक उपदेश
दिया| इस कारन
से यह स्थान चौरासी धुना के नाम से जग में ख्यात हुआ|
कालांतर में उदासीन संप्रदाय के अंतिम
आचार्य जगतगुरु उदासिनाचार्य श्री चन्द्र भगवान इस स्थान पर आये और पुनः सनकादिक
ऋषियों के द्वारा स्थापित चौरासी धुनो को जागृत कर पुनः प्रज्वलित किया और उदासीन
संप्रदाय के एक तीर्थ के रूप में इसे महिमामंडित किया| यह स्थान आज भी उदासीन संप्रदाय के
अधीन है और वहां पर उदासी संत निवास करते हैं| आने वाले यात्रियों, भक्तों एवं संतों की निवास, भोजन आदि की व्यवस्था भी निःशुल्क रूप
से चौरासी धुना उदासीन आश्रम के द्वारा की जाती है| जो यात्री भेंट द्वारका दर्शन हेतु
जाते हैं वे चौरासी धुना तीर्थ के दर्शन हेतु अवश्य जाते हैं| ऐसी अवधारणा है की चौरासी धुनो के
दर्शन करने से मनुष्य की लाख चौरासी कट जाती है, अर्थात उसे चौरासी लाख योनियों में
भटकना नहीं पड़ता और वह मुक्त हो जाता है|
रणछोड़ जी मंदिर
रणछोड़ जी के मन्दिर की ऊपरी मंजिलें देखने योग्य है। यहां भगवान
की सेज है। झूलने के लिए झूला है। खेलने के लिए चौपड़ है। दीवारों में बड़े-बड़े
शीशे लगे है। इन पांचों मन्दिरों के अपने-अलग भण्डारे है। मन्दिरों के दरवाजे सुबह
ही खुलते है। बारह बजे बन्द हो जाते है। फिर चार बजे खुल जाते है। और रात के नौ
बजे तक खुले रहते है। इन पांच विशेष मन्दिरों के सिवा और भी बहुत-से मन्दिर इस
चहारदीवारी के अन्दर है। ये प्रद्युम्नजी, टीकमजी, पुरूषोत्तमजी, देवकी माता, माधवजी अम्बाजी और गरूड़ के मन्दिर
है। इनके सिवाय साक्षी-गोपाल, लक्ष्मीनारायण और गोवर्धननाथजी के मन्दिर है। ये सब मन्दिर
भी खूब सजे-सजाये है। इनमें भी सोने-चांदी का काम बहुत है।
बेट-द्वारका में कई तालाब है-रणछोड़
तालाब, रत्न-तालाब, कचौरी-तालाब और शंख-तालाब। इनमें
रणछोड तालाब सबसे बड़ा है। इसकी सीढ़िया पत्थर की है। जगह-जगह नहाने के लिए घाट
बने है। इन तालाबों के आस-पास बहुत से मन्दिर है। इनमें मुरली मनोहर, नीलकण्ठ महादेव, रामचन्द्रजी और शंख-नारायण के मन्दिर
खास है। लोगा इन तालाबों में नहाते है और मन्दिर में फूल चढ़ाते है।
शंख तालाब
रणछोड़ के मन्दिर से डेढ़ मील चलकर शंख-तालाब आता है। इस जगह भगवान
कृष्ण ने शंख नामक राक्षस को मारा था। इसके किनारे पर शंख नारायण का मन्दिर है।
शंख-तालाब में नहाकर शंख नारायण के दर्शन करने से बड़ा पुण्य होता है।
बेट-द्वारका से समुद्र के रास्ते जाकर
बिरावल बन्दरगाह पर उतरना पड़ता है। ढाई-तीन मील दक्षिण-पूरब की तरफ चलने पर एक
कस्बा मिलता है इसी का नाम सोमनाथ पट्टल है। यहां एक बड़ी धर्मशाला है और बहुत से
मन्दिर है। कस्बे से करीब पौने तीन मील पर हिरण्य, सरस्वती और कपिला इन तीन नदियों का
संगम है। इस संगम के पास ही भगवान कृष्ण के शरीर का अंतिम संस्कार किया गया था।
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