हमारे
धर्मग्रंथ तथा धर्माचार्य यही उपदेश देते हैं की मानव जीवन दुर्लभ है अत: उसका सदुपयोग बड़ी सजगता से किया जाना चाहिए। मानव शरीर को अति दुर्लभ इसलिए बतलाया गया है क्योंकि यह हमें अनायास ही नही मिला है बल्कि हमारे अनन्तानन्त पूर्व जन्मों के पुण्य कर्मो, संस्कारों तथा इश्वर की अहैतुकी कृपा के फल स्वरुप प्राप्त हुआ है। धर्म शाश्त्र बतलाते हैं कि यह शरीर हमें चोरासी लाख योनियों कि
यात्रा पूर्ण करने के पश्चात् उपलब्ध हुआ है। यह भी कहा गया है कि चोरासी लाख
योनियों का एक चक्र ८,४०,००,००० अर्थात (आठ करोड़ चालीस
लाख) वर्ष में पूरा होता है।
संत महात्मा कहते हैं कि देव योनी भोग योनी
है अर्थात पुन्य कर्मो में भोग पूरे होने के बाद फिर योनियों में जाना पड़ता है। देव योनी में कोई नया शुभ कर्म नही किया जा सकता। यही कारण है कि देवता भी मनुष्य शरीर के लिए लालायित रहते हैं। केवल मनुष्य योनी ही इसी योनी है जिसमें जीवात्मा पूर्व जन्मों के कर्मो का भोग करने के साथ-२ नये शुभ कर्म करके परमपद अर्थात मोक्ष का अधिकारी बन सकता है।
दो
पेरवाला मनुष्य तो कहलाता है पर जो मन से उस चेतन्य परमात्मा के साथ सम्बन्ध जोड़
ले वही सच्चे अर्थ में मनुष्य
है। गधा, घोड़ा, कुत्ता, बिल्ली या संसार में उलझनेवाले भोगी
व्यक्ति ने अपना मनुष्यता का अधिकार खो दिया है। जिसका मन परमात्मतत्व से, परमात्मज्ञान से, परमात्माधुर्य से जुड़ा है- ऐसे व्यक्ति
को शास्त्रीय भाषा में मनुष्य कहा गया है।
आहार
लेना, नींद करना, मुसीबत आये तो भयभीत हो जाना और संसारी
भोग भोगना- वे सब तो मनुष्य और पशु दोनों कर लेते हैं, पर एक धर्म, एक बड़ा भारी सदगुण मनुष्य में है की वह अपना मन परमात्मा में लगा सकता है। इसीलिए मनुष्य में मनुष्यत्व आता है नही तो मनुष्य होते हुए भी द्विपाद पशु ही है। मनुष्यत्व आना, फिर मोक्ष की इच्छा होना यानी सब दुखो से सदा के लिये छूटने की इच्छा, निर्बल नरायण को पाने की इच्छा, जैसे किसी का गला पकड़कर उसे पानी में डुबाया जाय तो उस समय वह बहार निकलने के सिवाय और कुछ नहीं चाहता है, ऐसे ही संसार के दुखों से, बन्धनों से, कष्टों से मुसीबतों से, अज्ञानांधकार व
जन्म-मरण के दुखों से बाहर
निकलने की, छूटने की इच्छा हो तो उसे मुमुक्षुत्व कहते हैं।
भगवान
राम सबका भला करे जय हो जगदेव बाबा की ।